बात है जब खेतेश्वर दाता समंदड़ी से जोधपुर के लिए प्रस्थान कर रहे थे।
समंदड़ी जंक्शन पर रेलगाड़ी के आते ही गुरुमहाराज अन्य स्वारियों की भाँति रेलगाड़ी में बैठ गए।
चलते-चलते रेल जब दूँदाड़ा स्टेशन पहुँची, तब टीटी टिकट के लिए आया।
खेतेश्वर दाता प्रथम सीट पर ही विराजमान थे।
टीटी ने गुरुमहाराज से टिकट माँगा।
खेतेश्वर दाता कहने लगे —
"मेरे पास टिकट नहीं है भाई।
मैं ठहरा सन्यासी, परमार्थ के लिए जीने वाला।
मेरे पास टिकट कहाँ से आएगी?"
तब टीटी ने गुरुमहाराज को कटु शब्द कहते हुए,
दूँदाड़ा स्टेशन पर ही उतार दिया।
खेतेश्वर दाता निराश होकर दूर एक बेंच पर जाकर शांत भाव से बैठ गए।
थोड़ी देर बाद जब रेलगाड़ी के रवाना होने का समय हुआ,
तो रेलगाड़ी का इंजन हाँफ गया!
रेलवे ड्राइवर के अथक प्रयासों के बाद भी,
जब गाड़ी ठस से मस नहीं हुई,
तो ड्राइवर और अन्य कर्मचारियों को संदेह हुआ कि —
"कारण कुछ और है... यूँ ही खड़ी-खड़ी गाड़ी का इंजन कैसे हाँफ सकता है?"
तभी कुछ लोग कहने लगे —
"आपने खेतारामजी बावजी को नीचे उतारा है, इसलिए यह सब हुआ है।
वो कोई साधारण संत नहीं हैं।
वो तो दिव्य पुरुष हैं।
आपको गुरुमहाराज से क्षमा माँगनी चाहिए।
बड़े दयालु संत हैं, जरूर क्षमा कर देंगे।"
लोगों की बातों और अपनी गलती का पश्चाताप करते हुए,
टीटी खेतारामजी महाराज के चरणों में गिर पड़ा।
वो कहने लगा —
"हे दाता! मैं आपको पहचान नहीं पाया।
आप तो साक्षात कोई परब्रह्म हैं।
मुझे क्षमा कर दीजिए।
मैं आजीवन आपके प्रति अपनी निष्ठा कभी कम नहीं होने दूँगा।"
तब खेतारामजी महाराज ने अपनी दिव्य झोली से
उसे कई शहरों के टिकट हाथ में थमा दिए,
और रेलगाड़ी को रवाना करने का इशारा किया।
जैसे ही इशारा हुआ,
रेलगाड़ी फिर से चल पड़ी।
गाड़ी चल पड़ी... पर श्रद्धा रुक गई — दाता के चरणों में!
तब से लोगों का विश्वास महाराज पर और भी सुदृढ़ होता गया।
चहुँओर गुरुमहाराज के इस चमत्कार से लोग प्रभावित हुए।
🙇♂️ जय खेतेश्वर दाता की! 🙇♂️










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