भानगढ़ का डरावना किला जंहा आज भी रहते है भूत / bhangadh ka Khatrnak 👽 fort

भारत… एक भूमि जहाँ हर ईंट के नीचे इतिहास सोया है… लेकिन कुछ जगहें ऐसी हैं… जहाँ इतिहास केवल सोया नहीं… कसमसाता है… और उन्हीं में से एक है… भानगढ़ का किला —
राजस्थान का वो किला, जिसके दरवाज़े सूरज ढलते ही बंद कर दिए जाते हैं। क्यों? क्योंकि यहाँ… कोई इंसान नहीं रहता — केवल आत्माएँ। 



17वीं शताब्दी में, अरावली की पहाड़ियों के बीच बसा था भानगढ़ — एक समृद्ध नगर, जहाँ संगीत गूंजता था, महलों में नृत्य होता था, और बाजारों में रौनक थी। यह नगर राजा माधो सिंह ने बसाया था — अंबेर के शक्तिशाली राजा मान सिंह के छोटे भाई। भानगढ़ की शान थी — रानी रत्नावती। कहते हैं, वो इतनी सुंदर थीं कि उनकी खूबसूरती पर चांद भी शरमा जाए। उनके विवाह प्रस्ताव चारों दिशाओं से आते, पर एक नजर उन पर किसी ऐसे की भी पड़ी, जिसकी नजरें सिर्फ प्यार नहीं… तमन्ना और तंत्र से भरी थीं। एक तांत्रिक — सिंधु सेवड़ा। भानगढ़ की सीमा पर रहता था, अघोरी साधना करता, और रातों में भूत-प्रेतों से बातें करता। वो रत्नावती से एकतरफा प्रेम करता था… और उसे अपने वश में करना चाहता था। एक दिन, उसने जादू-टोना कर एक तेल की शीशी रत्नावती की दासी को दी — जैसे ही रत्नावती उसे लगाएंगी, वो उसकी गुलाम बन जाएंगी। लेकिन… रत्नावती कोई साधारण स्त्री नहीं थीं। उन्हें शक हो गया। उन्होंने वह शीशी एक पत्थर पर दे मारी — और वह पत्थर गोल-गोल लुढ़कता हुआ तांत्रिक के ऊपर जा गिरा। मरणासन्न तांत्रिक ने अपनी आखिरी सांस में शाप दिया — ‘जिस नगर ने मेरी आत्मा को ठुकराया है… वह कभी आबाद नहीं रहेगा… हर दीवार ढहेगी… हर आत्मा भटकेगी… और भानगढ़ रहेगा वीरान… हमेशा के लिए।’ कुछ ही समय में, भानगढ़ पर अंधकार छा गया। युद्ध हुए, अकाल पड़ा, लोग लापता होने लगे। पूरा नगर उजड़ गया… और बस बचा — एक खंडहर, एक शाप, और एक कहानी। आज भी भानगढ़ किले के दरवाज़े सूर्यास्त से पहले बंद कर दिए जाते हैं। ASI — भारतीय पुरातत्व विभाग — ने बोर्ड लगाया है: ‘सूर्यास्त के बाद प्रवेश वर्जित है।’ कई लोगों ने रात में वहां से अजीब सी आवाजें, स्त्रियों की चीखें, घुंघरुओं की छनक और परछाइयों को चलते हुए देखा है। कुछ लौटे… और कुछ कभी नहीं। कई वैज्ञानिक आए… कैमरे लगाए… पर रहस्य अब भी वैसा ही है। क्या यह कहानी सिर्फ एक अफवाह है? या सच में आज भी रत्नावती की आत्मा उस किले की दीवारों में भटक रही है? भानगढ़ आज भी खड़ा है — अपने शाप के साथ। और हर साल, हजारों लोग वहाँ जाते हैं, उसी सवाल के जवाब में… क्या सच में भूत होते हैं? …शायद भानगढ़ जानता है…

संत श्री खेतारामजी महाराज का दिव्य चमत्कार

 बात  है जब खेतेश्वर दाता समंदड़ी से जोधपुर के लिए प्रस्थान कर रहे थे।




समंदड़ी जंक्शन पर रेलगाड़ी के आते ही गुरुमहाराज अन्य स्वारियों की भाँति रेलगाड़ी में बैठ गए।



चलते-चलते रेल जब दूँदाड़ा स्टेशन पहुँची, तब टीटी टिकट के लिए आया।

खेतेश्वर दाता प्रथम सीट पर ही विराजमान थे।



टीटी ने गुरुमहाराज से टिकट माँगा।

खेतेश्वर दाता कहने लगे —

"मेरे पास टिकट नहीं है भाई।

मैं ठहरा सन्यासी, परमार्थ के लिए जीने वाला।

मेरे पास टिकट कहाँ से आएगी?"



तब टीटी ने गुरुमहाराज को कटु शब्द कहते हुए,

दूँदाड़ा स्टेशन पर ही उतार दिया।





खेतेश्वर दाता निराश होकर दूर एक बेंच पर जाकर शांत भाव से बैठ गए।



थोड़ी देर बाद जब रेलगाड़ी के रवाना होने का समय हुआ,

तो रेलगाड़ी का इंजन हाँफ गया!


रेलवे ड्राइवर के अथक प्रयासों के बाद भी,

जब गाड़ी ठस से मस नहीं हुई,

तो ड्राइवर और अन्य कर्मचारियों को संदेह हुआ कि —

"कारण कुछ और है... यूँ ही खड़ी-खड़ी गाड़ी का इंजन कैसे हाँफ सकता है?"



तभी कुछ लोग कहने लगे —

"आपने खेतारामजी बावजी को नीचे उतारा है, इसलिए यह सब हुआ है।

वो कोई साधारण संत नहीं हैं।

वो तो दिव्य पुरुष हैं।

आपको गुरुमहाराज से क्षमा माँगनी चाहिए।

बड़े दयालु संत हैं, जरूर क्षमा कर देंगे।"


लोगों की बातों और अपनी गलती का पश्चाताप करते हुए,

टीटी खेतारामजी महाराज के चरणों में गिर पड़ा।



वो कहने लगा —

"हे दाता! मैं आपको पहचान नहीं पाया।

आप तो साक्षात कोई परब्रह्म हैं।

मुझे क्षमा कर दीजिए।

मैं आजीवन आपके प्रति अपनी निष्ठा कभी कम नहीं होने दूँगा।"


तब खेतारामजी महाराज ने अपनी दिव्य झोली से

उसे कई शहरों के टिकट हाथ में थमा दिए,

और रेलगाड़ी को रवाना करने का इशारा किया।



जैसे ही इशारा हुआ,

रेलगाड़ी फिर से चल पड़ी।

गाड़ी चल पड़ी... पर श्रद्धा रुक गई — दाता के चरणों में!


तब से लोगों का विश्वास महाराज पर और भी सुदृढ़ होता गया।

चहुँओर गुरुमहाराज के इस चमत्कार से लोग प्रभावित हुए।


🙇‍♂️ जय खेतेश्वर दाता की! 🙇‍♂️


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